उत्तराखंड

चैत्र नवरात्रों में बड़ी संख्या में दर्शनों के लिए पहुंच रहे भक्त सिद्धपीठ काली शिला

गुप्तकाशी।  जनपद रुद्रप्रयाग के सिद्धपीठ कालीमठ मन्दिर के पूरब भाग में लगभग एक योजन की दूरी पर सिद्धपीठ काली शिला पुण्य स्थान विद्यमान है। इस पुण्य स्थान में भगवती काली की पूजा एक विशाल शिला में की जाती है। कालीमठ से पैदल यात्रा कर भक्त यहां पहुंचते हैं। इस वर्ष चैत्र नवरात्रों में माता के इस मंदिर में बड़ी संख्या में भक्त दर्शनों के लिए पहुंच रहे हैं।

महाकवि कालिदास ने भी अपनी रचनाओं में हिमालय के साथ कालीमठ घाटी के तीर्थों का विस्तृत वर्णन किया है।

स्कन्द पुराण के केदार खण्ड के अध्याय संख्या 89, 90, 91 व 92 में भगवती के शक्तिपुंज कालीमठ, कोटि माहेश्वरी, मनणामाई तीर्थ, राकेश्वरी तीर्थ तथा काली शिला का वर्णन किया गया है।भगवती काली की तपस्थली काली शिला तीर्थ को प्रकृति ने अपने वैभवो का भरपूर दुलार दिया है। बसन्त व शरद ऋतु में काली शिला के प्राकृतिक सौन्दर्य पर चार चांद लग जाते है। सिद्धपीठ काली शिला में जो मनुष्य भगवती काली को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करता है उसे मनौवाछित फल की प्राप्ति होती है। यह तीर्थ चारों ओर अपार वन सम्पदा से घिरा हुआ है। स्थानीय जनता द्वारा समय – समय पर सिद्धपीठ काली शिला में धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है, तथा चैत्र व आश्विन के नवरात्रों में भक्तों का आवागमन होने से यहाँ का वातावरण भक्तिमय बना रहता है।

जर्मनी निवासी सरस्वती विगत कई वर्षों से सिद्धपीठ काली शिला में भगवती काली की तपस्या में लीन है। सिद्धपीठ काली शिला में जो मनुष्य धार्मिक अनुष्ठान करता है उसे निसन्देह मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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