उत्तराखंड

बसन्त के आगमन पर पहाड़ में आज से हुआ बाल लोक पर्व फूलदेई का आगाज।

नितिन जमलोकी/केदारघाटी

रुद्रप्रयाग।   फूलदेई का यह पर्व चैत्र मास की संक्रांति व बसंत ऋतु के आगमन से शुरू हो गया है। जिस पर अनेक किस्म के फूल जैसे बुरांस ,फ्यूंली आड़ू ,पँया आदि अनेक फूलों को तोड़कर प्रातः गांव में घरों की दहलीज पर फूल डालकर बसंत ऋतु के आगमन पर खुशियां व्यक्त करते हैं। कतिपय स्थानों पर फूलदेई पर्व को बच्चे डोली स्वरूप फूलदेई को मनाते हैं, जिसे अनेक फूलों से सजाया जाता है। इस डोली को घोघा राजा के रूप में जाना जाता है। पहाड़ों में कतिपय स्थानों पर बच्चे यह पर्व एक माह तक व कुछ स्थानों पर चैत्र मास के प्रथम आठ दिन तक ही मनाया जाता है।

यह परम्परा पहाड़ों में सदियों से चली आ रही है। अंतिम दिन बच्चे एक स्थान पर एकत्रित होकर फूलदेई स्वरूप घोघा राजा की पूजा अर्चना के पश्चात भोग लगाकर स्वयं भी भोजन करते हैं।

उत्तराखंड का सुप्रसिद्ध बाल लोकपर्व फूलदेई का आज से शुभारम्भ हो गया है। फूलदेई पर्व का उत्तराखंड में विशेष महत्व है, यह लोकपर्व बड़े धूमधाम से पहाड़ों में मनाया जाता है। इसी को गढ़वाल में फूल संक्रांत ओर कुमाँऊ में फूलदेई पर्व कहा जाता है।

चैत्र महीने की संक्रांति को जब उत्तराखंड की ऊंची पहाड़ियों से बर्फ पिघलने लगती है। सर्दियां कम होने का एहसास हो जाता है, पहाड़ों में खुशहाली के दिन की शुरुआत बुरांस के फूल चारों ओर दिखने लगते हैं। तब पूरे इलाके की खुशहाली के लिए फूलदेई त्यौहार मनाया जाता है।ये त्यौहार आम तौर पर छोटे बच्चों का त्योहार होता है। जिसे बच्चे बढ़ चढ़ कर मनाते हैं।

गांव के छोटे बच्चे सुबह जल्दी उठकर गांव के सभी घरों की चौखट की पूजाकर फूलदेई के गीत गाते हैं। बच्चे फूलदेई, छम्मा देई गीत गाकर परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।

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