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दिल्ली में प्रदूषण से राहत की नई उम्मीद: जल्द हो सकती है कृत्रिम बारिश (Cloud Seeding)

नई दिल्ली। देश की राजधानी में बढ़ते प्रदूषण स्तर से लोगों को राहत दिलाने के लिए सरकार अब कृत्रिम बारिश (Cloud Seeding) का सहारा लेने की तैयारी कर रही है। राजधानी में लगातार बिगड़ती वायु गुणवत्ता (Air Quality Index) ने हालात को गंभीर बना दिया है, जिसके चलते पर्यावरण विभाग और IIT कानपुर के विशेषज्ञ मिलकर Cloud Seeding प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं।

🔹 क्या है Cloud Seeding?

 

Cloud Seeding यानी कृत्रिम रूप से बादलों से बारिश करवाने की तकनीक।

इसमें विमान या ड्रोन के माध्यम से बादलों में सिल्वर आयोडाइड (Silver Iodide) या सोडियम क्लोराइड (NaCl) जैसे रसायन छोड़े जाते हैं।

ये रसायन बादलों में नमी को बढ़ाते हैं, जिससे कृत्रिम बारिश होती है।

 

🔹 क्यों ज़रूरी है ये कदम?

 

दिल्ली में अक्टूबर के आख़िरी हफ़्ते से ही PM2.5 और PM10 के स्तर ने खतरनाक सीमा पार कर ली है।

 

बीते दो दिनों में AQI 450 के पार पहुंच गया।

 

कई इलाक़ों में दृश्यता बेहद कम हो गई है।

 

स्कूलों और निर्माण कार्यों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं।

 

 

ऐसे में Cloud Seeding को प्रदूषण कम करने का एक आपात समाधान (Emergency Solution) माना जा रहा है।

 

🔹 IIT कानपुर का प्रोजेक्ट

 

IIT कानपुर के वैज्ञानिकों ने बताया कि यह प्रयोग पहली बार दिल्ली में किया जाएगा।

यदि मौसम अनुकूल रहा (बादल पर्याप्त घने हों), तो नवंबर के पहले सप्ताह में कृत्रिम बारिश कराई जा सकती है।

इसके लिए केंद्र सरकार ने दिल्ली सरकार, IMD और DGCA से अनुमति प्रक्रिया शुरू कर दी है।

 

🔹 क्या होगा फायदा?

 

कृत्रिम बारिश से हवा में मौजूद धूल और प्रदूषक तत्व नीचे बैठ जाते हैं।

 

AQI में तत्काल सुधार देखा जा सकता है।

 

अस्थायी रूप से 24–48 घंटे तक साफ हवा मिल सकती है।

 

 

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थायी समाधान नहीं, बल्कि अस्थायी राहत का तरीका है।

दीर्घकालिक समाधान के लिए वाहनों, उद्योगों और पराली जलाने पर नियंत्रण आवश्यक है।

 

🔹 जनता की उम्मीदें

 

दिल्लीवासियों को अब इस प्रयोग से बड़ी उम्मीदें हैं।

रहवासियों का कहना है कि यदि यह तकनीक सफल रही, तो यह न केवल दिल्ली बल्कि लखनऊ, पटना, कानपुर और अन्य प्रदूषित शहरों के लिए भी राहत का नया रास्ता खोल सकती है।

 

 

 

📅 (लेखक: यूके न्यूज़ 18 डिजिटल टीम)

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स्रोत: IIT कानपुर, पर्यावरण विभाग, IMD रिपोर्ट्स

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